विश्व रेडियो दिवस
जहाँ एक और देश में डिजिटल हो जाने की मुहिम जोर शोर से चल रही है। वही रेडियो भी विश्व पटल पर डिजिटल हो चला है। क्या भारत में डिजिटल रेडियो का सपना साकार होगा ?
ज्ञात हो कि भारत में रेडियो कि शुरुआत वर्ष 1923 में हुई थी। उसके बाद से रेडियो देश के इतिहास से कई महत्वपूर्ण लम्हों का गवाह भी रहा है। रेडियो के ज़रिये ही लोगो ने 11 मई 1947 को महात्मा गाँधी का भाषण सुना था। उसके बाद 1947 में देश के आज़ाद होने कि सुचना भी रेडियो के ज़रिये ही सुनी थी। देशवासियों ने तमाम बड़े नेताओ कि मृत्यु के शोक समाचार से लेकर इमरजेंसी लागू करने के फैसले कि घोषणा भी रेडियो पर ही सुनी थी।
अभी हमारे देश कि निनान्वे फीसदी आबादी तक रेडियो की पहुँच है। लेकिन डिजिटल रेडियो कि बात करे तो इसमें थोडा वक्त लगेगा। पहले भारत को डिजिटल बनना पड़ेगा फिर रेडियो डिजिटल बनेगा। इस खबर को भारत के नजरिये से भी देखना होगा। रेडियो पुरे भारत के दिल में बसता है। नार्वे विश्व का पहला देश बन चुका है जिसने डिजिटल रेडियो को अपना लिया है। नार्वे अपने रेडियो मोड़ को एनालॉग से डिजिटल कि तरफ शिफ्ट कर चुका है।
नार्वे में 1950 के दशक में FM रेडियो की शुरुआत हुई थी। जिसकी जगह अब डिजिटल रेडियो ने ले ली है। इस क्रांतिकारी बदलाव कि शुरुआत नार्वे के नाडलैंड से हुई है। नार्वे सरकार वर्ष 2017 के अंत तक पुरे नार्वे में FM रेडियो को बंद कर दिया है। जिसके के कारण हर साल करीब 160 करोड़ रूपए की बचत होगी। नार्वे में ज्यादातर कारो में FM रेडियो सुना जाता है।
डिजिटल रेडियो सिस्टम अपनाने में FM की लागत का महज आठवा हिस्सा ही खर्च करना पढ़ेगा। यानि ये बेहद सस्ता है।
एक स्थानीय अखबार की तरफ से कराए गये सर्वे में पाया गया कि नार्वे में छाछठ फीसदी लोग इसके विरोध में है। और सिर्फ सत्रह फीसदी लोगो ने DAB तकनीक का समर्थन किया है। डिजिटल रेडियो आ जाने से नार्वे में एक ही झटके में करीब अस्सी लाख रेडियो सेट हमेशा के लिए बेकार हो जायगे।
11 जनवरी 2017, 11:11 मिनट नॉर्वे के लोगो के लिए एतिहासिक समय बन गया। डिजिटल आडियो ब्रॉडकास्टिंग यानि डेब(DAB) अपना लिया है। सालाना करीब दो करोड़ पैतीस लाख डॉलर कि बचत होगी। लोगो को बेहतर साउंड कवालिटी के साथ ज्यादा चैनल सुनने को मिलेगे। पहले नार्वे में FM के सहारे पाच रेडियो चैनल चलते थे और वही 11 जनवरी 2017 के बाद 40 चैनल आराम से चलाये जा रहे है। जब DAB ने इसको रिप्लेस किया तो चैनल की संख्या और कवालिटी में बहोत फर्क आया है। DAB तकनीक जिसे इंटरनेट से चलाया जा सकता है, कही भी किसी भी तरह से चलाया जा सकता है। इंटरनेट कि वजह से बेहतर कवालिटी मिलती है।
जानकारों का कहना है कि DAB तकनीक से रेडियो कि कवालिटी सीडी जैसी होती है। DAB तकनीक से रेडियो में गाने कि पूरी लिस्ट बनी होती है। कौन सा गाना चलाया जाना है , और कौन सा गाना चलाया जा चुका है उसकी पूरी जानकारी होती है। DAB तकनीक से आपका कोई पसदीदा गाना छुट गया है तो उसे आप फिर से चला सकते है। DAB तकनीक के रेडियो में सन्देश आसानी से जनता तक पहुचाया जा सकता है। DAB तकनीक के कारण किसी भी चैनल को FM चैनल जितनी समस्याओ का सामना नही करना पड़ेगा। DAB के आने के बाद केवल एक यंत्र नहीं अपितु चलता फिरता म्यूजिक सिस्टम बन जायगा। बीस फीसदी हें कारो में DAB तकनीक है। नार्वे में बाकि बचे लोगो को DAB तकनीक से रेडियो सुनने के लिए 174 डॉलर खर्च आएगा। यूरोप जैसे सम्पन्न देश में भी रेडियो को 2020 तक ही पूरी तरह से डिजिटल कर पायगे। स्विजरलैंड को भी 2020 तक का इंतजार करना पढ़ेगा। भारत का रेडियो शायद इसके बाद ही डिजिटल फ्रिकवेनसी को पकड पाएगा।
ज्ञात हो कि भारत में रेडियो कि शुरुआत वर्ष 1923 में हुई थी। उसके बाद से रेडियो देश के इतिहास से कई महत्वपूर्ण लम्हों का गवाह भी रहा है। रेडियो के ज़रिये ही लोगो ने 11 मई 1947 को महात्मा गाँधी का भाषण सुना था। उसके बाद 1947 में देश के आज़ाद होने कि सुचना भी रेडियो के ज़रिये ही सुनी थी। देशवासियों ने तमाम बड़े नेताओ कि मृत्यु के शोक समाचार से लेकर इमरजेंसी लागू करने के फैसले कि घोषणा भी रेडियो पर ही सुनी थी।
अभी हमारे देश कि निनान्वे फीसदी आबादी तक रेडियो की पहुँच है। लेकिन डिजिटल रेडियो कि बात करे तो इसमें थोडा वक्त लगेगा। पहले भारत को डिजिटल बनना पड़ेगा फिर रेडियो डिजिटल बनेगा। इस खबर को भारत के नजरिये से भी देखना होगा। रेडियो पुरे भारत के दिल में बसता है। नार्वे विश्व का पहला देश बन चुका है जिसने डिजिटल रेडियो को अपना लिया है। नार्वे अपने रेडियो मोड़ को एनालॉग से डिजिटल कि तरफ शिफ्ट कर चुका है।
नार्वे में 1950 के दशक में FM रेडियो की शुरुआत हुई थी। जिसकी जगह अब डिजिटल रेडियो ने ले ली है। इस क्रांतिकारी बदलाव कि शुरुआत नार्वे के नाडलैंड से हुई है। नार्वे सरकार वर्ष 2017 के अंत तक पुरे नार्वे में FM रेडियो को बंद कर दिया है। जिसके के कारण हर साल करीब 160 करोड़ रूपए की बचत होगी। नार्वे में ज्यादातर कारो में FM रेडियो सुना जाता है।
डिजिटल रेडियो सिस्टम अपनाने में FM की लागत का महज आठवा हिस्सा ही खर्च करना पढ़ेगा। यानि ये बेहद सस्ता है।
एक स्थानीय अखबार की तरफ से कराए गये सर्वे में पाया गया कि नार्वे में छाछठ फीसदी लोग इसके विरोध में है। और सिर्फ सत्रह फीसदी लोगो ने DAB तकनीक का समर्थन किया है। डिजिटल रेडियो आ जाने से नार्वे में एक ही झटके में करीब अस्सी लाख रेडियो सेट हमेशा के लिए बेकार हो जायगे।
11 जनवरी 2017, 11:11 मिनट नॉर्वे के लोगो के लिए एतिहासिक समय बन गया। डिजिटल आडियो ब्रॉडकास्टिंग यानि डेब(DAB) अपना लिया है। सालाना करीब दो करोड़ पैतीस लाख डॉलर कि बचत होगी। लोगो को बेहतर साउंड कवालिटी के साथ ज्यादा चैनल सुनने को मिलेगे। पहले नार्वे में FM के सहारे पाच रेडियो चैनल चलते थे और वही 11 जनवरी 2017 के बाद 40 चैनल आराम से चलाये जा रहे है। जब DAB ने इसको रिप्लेस किया तो चैनल की संख्या और कवालिटी में बहोत फर्क आया है। DAB तकनीक जिसे इंटरनेट से चलाया जा सकता है, कही भी किसी भी तरह से चलाया जा सकता है। इंटरनेट कि वजह से बेहतर कवालिटी मिलती है।
जानकारों का कहना है कि DAB तकनीक से रेडियो कि कवालिटी सीडी जैसी होती है। DAB तकनीक से रेडियो में गाने कि पूरी लिस्ट बनी होती है। कौन सा गाना चलाया जाना है , और कौन सा गाना चलाया जा चुका है उसकी पूरी जानकारी होती है। DAB तकनीक से आपका कोई पसदीदा गाना छुट गया है तो उसे आप फिर से चला सकते है। DAB तकनीक के रेडियो में सन्देश आसानी से जनता तक पहुचाया जा सकता है। DAB तकनीक के कारण किसी भी चैनल को FM चैनल जितनी समस्याओ का सामना नही करना पड़ेगा। DAB के आने के बाद केवल एक यंत्र नहीं अपितु चलता फिरता म्यूजिक सिस्टम बन जायगा। बीस फीसदी हें कारो में DAB तकनीक है। नार्वे में बाकि बचे लोगो को DAB तकनीक से रेडियो सुनने के लिए 174 डॉलर खर्च आएगा। यूरोप जैसे सम्पन्न देश में भी रेडियो को 2020 तक ही पूरी तरह से डिजिटल कर पायगे। स्विजरलैंड को भी 2020 तक का इंतजार करना पढ़ेगा। भारत का रेडियो शायद इसके बाद ही डिजिटल फ्रिकवेनसी को पकड पाएगा।
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