सुरक्षा नियमों में कमी या मानवीय भूल हादसों के लिए जिम्मेदार!

मध्य प्रदेश में सड़क हादसों का ग्राफ बढ़ता जा रहा है सरकार चेकिंग अभियान चलाकर वाहनों पर कार्रवाई के जरिए हादसों को रोकने की कोशिश कर रही है सरकार की ये कोशिश सरकारी खजाने को भरने के लिए ठीक है, लेकिन बात हर साल बढ़ रहे सड़क हादसों को रोकने की करें, तो सरकार फेल ही साबित होती है। वही एक और वाहनों के टकराव और उचित सड़क सुरक्षा उपायों की अनदेखी के कारण सड़क हादसा बेहद आम होता जा रहा है। सड़क सुरक्षा नियमों की अनदेखी और वाहनों की भिड़ंत से हादसों से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ रही है। सभी सड़कें पूरे दिन के लिये व्यस्त होती हैं जहाँ वाहन अपने उच्च गति से दौड़ाते है। वर्तमान में लोगों को अपने नीजि वाहनों की आदत है जिसकी वजह से सड़कों पर यातायात की समस्या पहले के मुकाबले ज्यादा बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में, सावधानीपूर्वक सुरक्षित चालन की क्रिया के लिये यातायात नियमों और सड़क सुरक्षा नियमों का अनुसरण लोगों से अपेक्षित है। तब जाकर कहीं सड़क हादसों पर काबू पाया जा सकेगा। सड़क हादसे कितने खतरनाक होते हैं, इन हादसों के शिकार लोगों पर क्या गुजरती है, उनके परिजनों से बेहतर भला कौन समझेगा. सड़क हादसों की ये घटनाएं भारत में अब आम हो चुकी हैं. इन्हें रोक पाने में सरकार लाचार और बेबस नजर आ रही है. अधिकांशतः सड़क हादसों के शिकार लोग साधारण पृष्ठभूमि से होते हैं, यही कारण है कि ऐसी घटनाएं अखबारों या चैनलों की सुर्खियां नहीं बन पाती हैं। परंतु, इस घटना ने एक बार फिर से सड़क हादसों की गहराती समस्या की ओर देश और प्रदेश का ध्यान आकर्षित किया है। इंदौर में सड़क दुर्घटना में 5 बच्चों समेत बस ड्राइवर की मौत हो गई। इस हादसे में स्कूल बस के ड्राइवर की लापरवाही का मामला सामने आया है । नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक देश में सड़क हादसों की ग्राफ पिछले कुछ सालों की तुलना में वर्ष 2014 में 2.9 फीसदी बढ़ा है। इस दौरान देश में कुल साढे चार लाख सड़क हादसे हुए। जिसमें 1.41 लाख लोगों की मौत हो गई।जबकि करीब दो लाख से ज्यादा लोग इस हादसों में अपंग भी हो गए। सड़क हादसों के मामले में चौथे नंबर पर मध्य प्रदेश हैं। मप्र को शर्मसार करने वाले यह आंकड़े नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा वर्ष 2014-15 के सड़क हादसों को लेकर जारी रिपोर्ट मे सामने आए है। मध्यप्रदेश में 2014 में 39698, तो 2015 में ये ग्राफ बढ़कर 40859 पहुंच गया। एक सर्वे के मुताबिक 60 फीसदी से ज्यादा सड़क हादसों में ड्राइवर की गलती होती है। ज्यादातर हादसे ओवर स्पीड, लालबत्ती की अनदेखी, गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात करना और नशे में गाड़ी चलाने के कारण होते हैं। इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता है कि पिछले दस वर्षो में वाहनों की संख्या में दोगुना इजाफा हुआ है. वहीं सड़कों का विस्तारीकरण इस बढ़ोतरी के सापेक्ष बहुत कम हुआ है. ऐसे में सवाल है कि क्या हमारी सड़कें यातायात के इस बढ़ते बोझ को सह पाने के लिए सक्षम हैं? इंटरनेशनल रोड फेडरेशन के एक खुलासे के अनुसार 90 फीसद हादसों का कारण देश में ड्राइवरों की गलती की वजह से होते हैं। तब यह भी मान लेना गलत नहीं होगा कि लाइसेंसिंग विभाग भी इन हादसों के लिए जिम्मेदार है. क्या लाइसेंसिंग प्रक्रिया को ताक पर रखकर वाहन चालकों को लाइसेंस दिए जा रहे हैं? क्या ड्राइविंग लाइसेंस देते समय कायदे से जांच-पड़ताल की जाती है? क्या सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखकर वाहनों की जांच-पड़ताल होती है? ऐसे कई सवाल हैं जो सड़क हादसे में मरने वालों के लिए जिम्मेदार हैं. सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाली सरकारों को क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि लोगों की जिंदगी से जुड़े कानून में बदलाव किया जाए? बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं, उनके निराकरण को प्रमुखता से अपने एजेंडे में शामिल करना भी तो सरकार का ही काम है. सोचना होगा कि आखिर इन दुर्घटनाओं के लिए कौन जिम्मेदार है; कानून की कमी या फिर चाहे-अनचाहे में होने वाली लापरवाही?   

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